(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 12. शान्तिपर्व(महाभारत)


॥ श्रीः ॥
12.372. अध्यायः 372
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Topics
आश्चर्थकथनं प्रार्थितेन नागेन सूर्यमण्डले तत्तुल्यतेजोन्तरप्रवेशदर्शनकथनम्॥ 1॥


Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Text

ब्राह्मण उवाच। 12-372-0x(6676)(80704)
विवस्वतो गच्छति पर्ययेण
वोडुं भवांस्तं यथमेकचक्रम्।
आश्चर्यभूतं यदि तत्र किंचि
द्दृष्टं त्वयाशंसितुमर्हसि त्वम्॥ 12-372-1(80705)
नाग उवाच। 12-372-2x(6677)
आश्चर्याणामनेकानां प्रतिष्ठा भगवान्रविः।
यतो भूताः प्रवर्तन्ते सर्वे त्रैलोक्यसंमताः॥ 12-372-2(80706)
यस्य रश्मिसहस्रेषु शाखास्विव विहंगमाः।
वसन्त्याश्रित्य मुनयः संसिद्धा दैवतैः सह॥ 12-372-3(80707)
यतो पायुर्विनिःसृत्य सूर्यरश्म्याश्रितो महान्।
विजृम्भत्यम्बरे तत्र किमाश्चर्यमतः परम्॥ 12-372-4(80708)
विभज्यं तं तु विप्रर्षे प्रजानां हितकाम्यया।
तोयं सृजति वर्षासु किमाश्चर्यमतः परम्॥ 12-372-5(80709)
यस्य मण्डलमध्यस्थो महात्मा परमत्विषा। 12-372-6 दीप्तः समीक्षतेऽलोकान्किमाश्चर्यमतः परम्॥ 12-372-6(80710)
शुक्रो नामासितः पादो यश्च वारिधरोऽम्बरे।
तोयं सृजति वर्षासु किमाश्चर्यमतः परम्॥ 12-372-7(80711)
योऽष्टमासांस्तु शुचिना किरणेनोक्षितं पयः।
प्रत्यादत्ते पुनः काले किमाश्चर्यमतः परम्॥ 12-372-8(80712)
यस्य तेजोविशेषेषु स्वयमात्मा प्रतिष्ठितः।
यतो बीजं मही चेयं धार्यते सचराचरम्॥ 12-372-9(80713)
यत्र देवो महाबाहुः शाश्वतः पुरुषोत्तमः।
अनादिनिधनो विप्र किमाश्चर्यमतः परम्॥ 12-372-10(80714)
आश्चर्याणामिवाश्चर्यमिदमेकं तु मे शृणु।
विमले यन्मया दृष्टमम्बरे सूर्यसंश्रयात्॥ 12-372-11(80715)
पुरा मध्याह्नसमये लोकांस्तपति भास्करे।
प्रत्यादित्यप्रतीकाशः सर्वतः समदृश्यत॥ 12-372-12(80716)
स लोकांस्तेजसा सर्वान्स्वभासा निर्विभासयन्।
आदित्याधिमुखोऽभ्येति गगनं पाटयन्निव॥ 12-372-13(80717)
हुताहुतिरिव ज्योतिर्व्याप्य तेजोमरीचिभिः।
अनिर्देश्येन रूपेण द्वितीय इव भास्करः॥ 12-372-14(80718)
तस्याभिगमनप्राप्तौ हस्तौ दत्तौ विवस्वता।
तेनापि दक्षिणो हस्तो दत्तः प्रत्यर्चितार्थिना॥ 12-372-15(80719)
ततो भित्त्वैव गगन प्रविष्टो रश्मिमण्डलम्।
एकीभूतं च तत्तेजः क्षणेनादित्यतां गतम्॥ 12-372-16(80720)
तत्र नः संशयो जातस्तयोस्तेजः समागमे।
अनयोः को भवेत्सूर्यो रथस्थो योऽयमागतः॥ 12-372-17(80721)
ते वयं जातसंदेहाः पर्यपृच्छामहे रविम्।
क एष दिवमाक्रम्य गतः सूर्य इवापरः॥ ॥ 12-372-18(80722)

इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि द्विसप्तत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः॥ 372॥

Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Footnotes

12-372-4 विसृजत्यम्बरे तोयमिति ट. पाठः॥ 12-372-5 तं वातं पुरोवातादिरूपेण विभज्य परिणामं नीत्वा॥ 12-372-6 महात्मान्तर्यामी॥ 12-372-7 पादइव पादोऽवयवः नीलमेघरूपेणाप्ययमेव वर्षतीत्यर्थः॥ 12-372-9 यतः सूर्यात्। बीजं औषधम्॥ 12-372-12 प्रत्यादिप्रतीकाशः आदित्यान्तरतुल्यतेजस्कः। समदृश्यत दृष्टः॥ 12-372-15 दत्तः प्रत्यर्चिनार्चिनेति ट. पाठः॥ 12-372-16 भित्त्वैव रविमण्डलमिति ट. पाठः॥


Mahabharat- Hindi (Devanagari) 100000 shlokas

www.sanatanadharm.com - play store app (sanatana dharm)

"Bharathiya Sanatana Dharm" and Sanatana Dharmam & Dharmo rakshati Rakshitha logo are our trademarks. Unauthorised use of "Sanatana Dharmam & Dharmo rakshoati Rakshitha" and the logo is not allowed. Copyright © sanatanadharm.com All Rights Reserved . Made in India.